राजनीति पर जेन जी का असर

भोजपुरी इलाके में पहले रात को जब छोटे बच्चे नहीं सोते थे तो उन्हें यह कहकर डराया जाता था कि जल्दी सो जाओ वरना “ हुंड़ार “ आयेगा और ले जाएगा। आजतक यह समझ में नहीं आया कि यह “ हुंड़ार”  क्या होता है। इसका अस्तित्व कभी सामने नहीं आया, न दिखा। पहले गांवों में जब रात शुरू होती थी तो सियारों की हुआं, हुआं की समवेत आवाज सुनाई पड़ती थी। सियारों को देखा भी जाता था। यह कुत्ते की तरह होता है।

लेकिन वह किसी लड़के को ले जाने की स्थिति में नहीं होता। हुंड़ार सियार से थोड़ा बड़ा होता होगा, ऐसा बस अंदाजा लगता था। लेकिन ऐसा भी नहीं कि वह शेर और बाघ की तरह होता था। 1975 में जब फिल्म “ शोले “ आई तो उसमें फिल्म के खलनायक गब्बर सिंह का एक डॉयलॉग मशहूर हुआ। यहां से पचास-पचास कोस दूर गांव में जब बच्चा रात को रोता है तो मां कहती है कि बेटे सो जा, सो जा, नहीं तो गब्बर आ जाएगा। अब जब उम्र के चौथेपन में हैं तो सरकार को डराते सुन रहे हैं कि सुधर जाओ वरना जेन जी आ जाएगा।

जंतर-मंतर पर जेन जी ने जो किया है, वह काबिले तारीफ है। अभी तक मोदी सरकार के बारे में कहा जाता था कि यह अहंकार में डूबी हुई है। अपनी मनमर्जी चलाती है। किसी का कहा नहीं सुनती, किसी के दबाव में काम नहीं करती। इसके सीनियर मंत्री तक उसी दंभ का परिचय देते हुए कहते थे कि यह यूपीए की सरकार नहीं है। यहां इस्तीफे नहीं होते। लेकिन जेन जी ने जंतर-मंतर पर दबाव बनाकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। बात इतने से भी शांत नहीं हुई। संसद का पूरा मानसून सत्र उस आंदोलन की भेंट चढ़ने जा रहा है।

जंतर मंतर की घटना के बाद सरकार के सबसे ताकतवर दो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सदन में जाने तक की हिम्मत नहीं जुटा रहे। विपक्ष के हंगामे के कारण संसद कायदे से अभी तक पूरे मानसून सत्र में चल ही नहीं पाई। विपक्ष लगातार छात्रों पर लाठी चार्ज, आंसू गैस और पैलट गन का इस्तेमाल करने के लिए गृह मंत्री अमित शाह से सदन में आने और इस पर बयान देने की मांग कर रहा है। यह जेन जी का असर है। अब तो लोग जेन जी के नाम पर सरकार को डराने लगे हैं। कहने लगे हैं कि इस सरकार को जेन जी ही सुधारेगा। अभी हाल ही में प्रयागराज में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने छात्रों के साथ संवाद किया। “ छात्रों की गूंज “ नाम से आयोजित इस कार्यक्रम में छात्रों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।

इसे भी कहा जा रहा है कि जेन जी का राहुल गांधी को समर्थन मिल रहा है। जेन जी की ताकत को पक्ष-विपक्ष दोनों गंभीरता से महसूस कर रहे हैं। विपक्ष तो जेन जी के साथ पहले दिन से खड़ा है अब सत्ता पक्ष के लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और इनका पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी उनके साथ तालमेल बिठाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां आईआईटी के छात्रों से संवाद करने की कोशिश कर रहे हैं तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक के प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं कि जेन जी राष्ट्र विरोधी नहीं है और वो उन पर आंख मूंद कर भरोसा करेंगे। जबकि जेन जी का आंदोलन शुरू होते ही सरकार, पार्टी और संघ का पूरा ईको सिस्टम उन्हें देश विरोधी साबित करने पर तुला हुआ था।

नरेंद्र मोदी पिछले 12 सालों से देश के प्रधानमंत्री हैं। इनके नेतृत्व में 2014 में बीजेपी ने 282 सीटें जीतीं। नोटबंदी और जीएसटी से परेशानी और अलोकप्रिय होने के बावजूद 2019 के चुनाव में उसके सीटों की संख्या 282 से बढ़कर 302 हो गई। इसी से उत्साहित होकर मोदी जी ने नारा दिया अबकी बार चार सौ पार। लेकिन जनता ने उन्हें महज 240 पर ला पटका। उसमें भी 80 सीटों पर सवालिया निशान है। कहा गया कि अगर चुनाव आयोग निष्पक्ष चुनाव कराने में सफल होता तो बीजेपी 160 सीटों पर ही सिमटकर सत्ता से बाहर हो जाती। निश्चित रूप से यह मोदी जी के लिए चिंता की बात थी।

इन्होंने इसका रास्ता तीन तरह से निकालने की कोशिश की। एक, विशेष गहन पुनरीक्षण ( एसआईआर ), दो, एक देश एक चुनाव और तीन, लोक सभा की सीटें बढ़ाना। एसआईआर के जरिये चुनाव आयोग की मदद से मनमाने तरीके से लोगों के वोट काटे जा रहे हैं। इनमें ज्यादातर वो वोट हैं जो विपक्ष को मिलते हैं। साथ ही बीजेपी और एनडीए को मिलने वाले वोट जोड़े भी जा रहे हैं। यह सब प्रक्रिया आखिर में गुपचुप तरीके से की जाती है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में 28 लाख मतदाताओं को वोट ही नहीं डालने दिया गया। इसका नतीजा यह है कि बीजेपी जमीन पर चुनाव बुरी तरह से हारती दिखती है जबकि चुनाव नतीजों में वह बंपर जीत हासिल कर लेती है। देश में कहीं न कहीं हर साल चुनाव होते रहते हैं और लोग उस आधार पर सरकार से विफलता को लेकर सवाल उठाते रहते हैं। बीजेपी चाहती है कि सब चुनाव एक साथ हों, पांच साल में, ताकि बीच में कोई टोका-टोकी न करे।

इसीलिए एक देश, एक चुनाव का नारा दिया जा रहा है। बीजेपी का जो कुछ है सब उत्तर, पश्चिमी और पूर्वोत्तर भारत में ही है। दक्षिण भारत में कर्नाटक के अलावा इसका कहीं कुछ नहीं है। इसके लिए वह सीटों की संख्या आबादी के आधार पर बढ़ाना चाहती है। पिछले पचास सालों में दक्षिण भारत की आबादी उतनी नहीं बढ़ी जितनी उत्तर भारत की। उदाहरण के लिए आबादी के आधार पर अगर सीटें बढ़ाई जाएंगी तो उत्तर प्रदेश की 80 सीटें बढ़कर 120 हो जाएंगी और बिहार की 40 सीटें बढ़कर 60 से 72 के बीच हो सकती हैं। यानी सिर्फ दो राज्यों में ही 60 से 72 सीटें बढ़ जाएंगी। जबकि दक्षिण भारत के पांच राज्यों में कुल मिलाकर मुश्किल से 66 सीटें बढ़ेंगी। इस तरह प्रस्तावित लोक सभा की 850 सीटों के बाद अगर बीजेपी को दक्षिण भारत में न के बराबर सीटें मिलती हैं तो भी वह सत्ता हासिल कर सकती है।

ये तीनों ही काम बगैर चुनाव आयोग की मदद के नहीं हो सकते। लेकिन कोई भी व्यक्ति अपना गला बचाकर ही काम करता है। इसीलिए सरकार ने कानून बनाकर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को अभयदान दे दिया है। सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के लिए ऐसा प्रावधान बना दिया है जिससे उनके कामकाज से जुड़े मामलों में पूरी जिंदगी के लिए नागरिक और आपराधिक कार्रवाई से छूट मिलेगी। जाहिर सी बात है इतनी सुरक्षा मिलने के बाद कोई भी चुनाव आयुक्त सरकार के लिए बिना डरे काम कर सकता है। हाल के चुनावों में यह देखा भी गया है कि वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने किस तरह सत्ता पक्ष के हित में काम किया है।

लेकिन जेन जी ने यह स्थिति बदल दी है। कानून अपनी जगह है जनता का गुस्सा अपनी जगह। प्रधानमंत्री, गृह मंत्री संसद के सदनों में जाने से बच रहे हैं तो सत्ताधारी दल के नेताओं का सड़क पर चलना दूभर हो गया है। यह सब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार भी देख रहे हैं। वो भी सोच रहे होंगे कि जब सर्व शक्ति मान प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को जेन जी ने भीगी बिल्ली बना दिया है तो उनकी क्या बिसात।

इसलिए वो भी अब इतना ज्यादा आगे बढ़ कर जेन जी और आम लोगों के गुस्से से बचने की कोशिश करेंगे। वे भी नियम कानून के दायरे में ही रहकर काम करने की कोशिश करेंगे। और अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी की सत्ता जाती रहेगी। और एक बार सत्ता गई तो आगे आने वाले सत्ताधारी दल चुनाव आयुक्तों को मिलने वाली इम्युनिटी के प्रावधानों को बदल भी सकते हैं। जेन जी ने यह डर हर सत्ताधारी दल और उससे जुड़े संस्थानों के मन में बिठा दिया है। चुनाव आयुक्तों के मन में भी।

(अमरेंद्र कुमार राय वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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